Untitled Document
Untitled Document
Untitled Document
एक बूँद हूँ पर अन्तस में मैने सागर को पाया है, बनने को सागर बन जाउँ तटबन्धों से डर लगता है| सम्बन्धों से डर लगता है| अनुबन्धों से डर लगता है|
 दोहासागर
 

 साँठ-गाँ का दौर है, बदल रहे दिन-रात

मानव चतुर सुजान को , मूरख देते मात


दाँव-दाँव की बात है, दाँव है माया जाल

दाँव लगे राजा बने, दाँव पड़े कंगाल


जनसख्या के पेट में, समा रहे, वन, गाँव

प्यासा पनघट से मुड़े, थके-थके से पाँव


राम-राम तोता रटे, अर्थ ना जाने जीव

लाख करो तप साधना, भाव बिना निर्जीव


ज्ञान सखा परदेश में, ज्ञान ही सच्चा मीत

भवसागर तर जाये मन, करे ज्ञान संग प्रीत

 

Untitled Document
परिचय | मुखपृष्ठ | अनुभव की धारा | प्रैस | अपनों की नजर में | संस्मरण | सम्पर्क
सर्वाधिकार सुरक्षित © २०१० ईमेल : mail@gajendersolanki.com