हिन्दी पावन गंगा

 
 

उठ जाग भारत जाग रे

 
 

ना मैं छंदों का सौदागर

 
 

अंगारे लिख जाता हूँ

 
 

अभिनन्दन है

 
 

गीतों के बंजारे

 
 

मूरत है बलिदान की

 
 

विक्रमी संवत्

 
 

भोर की किरण कहे

 
 

स्वर्ण मंदिर : एक अनुभूति

 
 

  ॠतु-मिलन

 
 

 गोकुल है बेहाल

 
 

महावीर वंदना

 
 

शून्य और सृष्टि

 
 

बंधन

 
 

प्रेमाश्रु की गंगा

 
 

सम्बन्धों से डर लगता है

 
 

 

 
 

 

उठ जाग भारत जाग रे

आलस्य, निद्रा त्याग रे

पुरुषार्थ का बीड़ा उठा

जागेगा तेरा भाग्य रे

उठ जाग भारत जाग रे

 

टुकड़ों में जो तू बँट रहा

उत्साह तेरा घट रहा

संघर्ष की बेला है यह

तू एकता का बिगुल बजा

उठ जाग भारत जाग रे

 

 
 
 
   
 
     
 

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