हिन्दी पावन गंगा

 
 

उठ जाग भारत जाग रे

 
 

ना मैं छंदों का सौदागर

 
 

अंगारे लिख जाता हूँ

 
 

अभिनन्दन है

 
 

गीतों के बंजारे

 
 

मूरत है बलिदान की

 
 

विक्रमी संवत्

 
 

भोर की किरण कहे

 
 

स्वर्ण मंदिर : एक अनुभूति

 
 

  ॠतु-मिलन

 
 

 गोकुल है बेहाल

 
 

महावीर वंदना

 
 

शून्य और सृष्टि

 
 

बंधन

 
 

प्रेमाश्रु की गंगा

 
 

सम्बन्धों से डर लगता है

 
 

 

 
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
 

 

अंगारे लिख जाता हूँ

 

 

मेरे गीतों में भारत का स्वाभिमान लहराता है

मेरे छन्दों में संस्कृति का मेघ मल्हारें गाता है

सबके मन तक पहुँचाता है अंगारो की भाषा को

मन भारत-माँ की खुशियों के सपने रोज सजाता है

पर ना शान्ति-अहिंसा की जब राह दिखाई देती है

मेरे गीतों में भारत की आह सुनाई देती है

गली-गली कातिल मौसम जब शोले ही बरसाता हो

शैतानों के सर्वनाश की चाह दिखाई देती है

हाल वतन का लिखने को मैं जब भी कलम उठाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


जिसके मस्तक मुकुट हिमालय, दक्खिन सागर लहराता

राम-कृष्ण औ महावीर ने कहा जिसे अपनी माता

गौतम, नानक औ कबीर ने जिस धरती पर जन्म लिया

जिसके गौरव की गाथाएँ सदियों से यह जग गाता

जिसकी आज़ादी की ख़ातिर वीरों ने बलिदान दिये

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु ने फाँसी चढ प्रान दिये

जागती आँखों से देखे सपने माँ की आज़ादी के

नेताजी औ गाँधीजी ने भी सारे सुख दान दिये

राणा और शिवा, गुरु गोविन्द सिंह थे माँ के सेनानी

शेखर औ लक्ष्मीबाई ने भी तो दी थी कुर्वानी

देशभक्ति की लौ पर कितने ही परवाने खाक हुए

आजादी तो मिली मगर कीमत हमने कब पहचानी

देश पे मर-मिटनेवालों को श्रद्धा-सुमन चढाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


जिनका जीवन बलिदानों की एक छलकती गागर था

जिनका यौवन भी पौरुष का एक अमिट हस्ताक्षर था

देख अडिग निष्ठाएँ जिनकी ध्रुवतारा शर्माता था

भारत का इक-इक सेनानी दिव्य शौर्य का सागर था

जिन बेटों की चरण-धूलि पा भू पावन हो जाती थी

धवल चाँदनी जिन पर मोहित प्रेम-सुधा बरसाती थी

जिनके संकल्पो ने लक्ष्यों को इक नव परिभाषा दी

मलय पवन भी जिनके संघर्षो के गीत सुनाती थी

अपने गीतों के चंदन का उनको तिलक लगाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


जिस काले पानी के भय से पत्थरदिल दहलाते थे

जिस काले पानी में गोरे पल-पल जुल्म ढहाते थे

क्रान्तिकारियों पर अत्याचारों की लम्बी गाथा है

लोककथाओं मे नाना जी जिसका हाल सुनाते थे

आजादी की आशा केवल जिनका एक सहारा था

धन-दौलत की चाह नहीं थी स्वाभिमान ही प्यारा था

काला-पानी द्वीप नहीं है हिन्दुस्तानी तीरथ है      

आज़ादी के दीवानों से काला पानी हारा था

उन बलिदानी यादों के जब मन में दीप जलाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


वे क्या जानें लोकतन्त्र, बस जो देशद्रोह की बात करें

भ्रष्टाचारी चालें चलकर चुपके से आघात करें

लोकतन्त्र की आड़ मे कोई भी कुछ भी कर जाता हैं

लूट-पाट, घोटाले करके देशभक्ति की बात करें

लोकतन्त्र का कब मतलब है मनमाना हम काम करें

अमर शहीदों के सपनों को रुसवा सुबहो-शाम करें

मीर जाफरों, जयचन्दों का जोर दिखाई देता हैं

सरे-आम भारत की इज्जत दुनिया में नीलाम करें

आस्तीन के साँपो से जब अपना वतन बचाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


भ्रष्टाचारी शूल बिछे क्यों लोकतन्त्र की राहों में

झूल रही क्यों न्यायपालिका भ्रष्टाचारी बाहों में

न्यायालय तो लोकतन्त्र की मर्यादा के मंदिर है

लेकिन न्याय बिका मिलता क्यों सरे-आम चौराहों में

हमने समझा था जिनको वे साधक हैं उजियारों के

अब लगता वे भी बैठे हैं साये में अँधियारे के

जिनको भाग्य-बिधाता माना ,ईश्वर से बढकर जाना

लोकतन्त्र के वे रक्षक अब सौदे हैं बाजारों के

सिसक रहे इस लोकतन्त्र को जब भी धैर्य बँधाता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ


लोकतन्त्र में ही खेला था इक तस्कर खूनी दंगल

दन वाली खुश्बू में घुलती थी तूफानी हलचल

लोकतन्त्र के गालों पर वीरप्पन एक तमाचा था

एक जाफना बना हुआ था सत्य मंगलम् का जंगल

नक्कीरन का गोपालन ही क्यों जंगल जा सकता था

वीरप्पन कि माँगों का कैसेट भर कर ला सकता था

सोच रहा हूँ क्या अधिकारी अंधे, गूँगें, बहरे थे

ऐसे तो कल को वीरप्पन संसद मे आ सकता था

लोकतन्त्र यदि यही तो इसकी छाया से घबराता हूँ

शबनम भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ

 
 
 
   
 
     
 

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